Politics

J-K: वक्त ने करवटें बदलीं लेकिन घाटी लहूलुहान होती रही, अब तक 9 बार बदल चुका है कश्मीर का इतिहास-भूगोल

J-K: वक्त ने करवटें बदलीं लेकिन घाटी लहूलुहान होती रही, अब तक 9 बार बदल चुका है कश्मीर का इतिहास-भूगोल
J-K: वक्त ने करवटें बदलीं लेकिन घाटी लहूलुहान होती रही, अब तक 9 बार बदल चुका है कश्मीर का इतिहास-भूगोल
20views

कश्मीर में बढ़ते आतंकी हमलों और टारगेट किलिंग ने फिर कश्मीर के मुद्दे को चर्चा में ला दिया है. कश्मीर के सदियों पुराने इतिहास में पिछले 7 दशकों ने विवाद की लंबी फेहरिस्त पेश की है. लेकिन इसे और पीछे जाकर देखने की जरूरत है कि कैसे विवाद पैदा हुआ और इतिहास के किन पन्नों ने कश्मीर के भूगोल को वक्त-वक्त पर तय किया

साल 1947 में जुलाई का महीना चल रहा था… भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की तैयारी जोरों पर थी. दोनों देशों की सीमाएं तय हो रही थीं. सिरिल रैडक्लिफ की अगुवाई वाली कमेटी मैप पर लकीरें खींचकर लाखों-करोड़ों लोगों की किस्मत का फैसला करने में जुटी थी. दुनिया के नक्शे पर दो देश बन रहे थे. दिल्ली से लंदन तक हलचल तेज थी. मैप बनाने वालों को इंसानों की फिक्र कम इलाकों की ज्यादा थी. जिले-तहसील और गांव-कस्बे मैप पर ताश के पत्तों की तरह इधर से उधर फेंटे जा रहे थे. मैप को लेकर सियासी नूराकुश्ती भी तेज थी.

लोगों में भी अफवाहें खूब चल रही थीं. खासकर बॉर्डर बन रहे इलाकों में, कि किसका इलाका कहां जाएगा. कभी पड़ोस का जिला उस देश में चला जाता तो कभी पास का जिला इस पार के मैप में शामिल बताया जाता. वैसे तो कश्मीर रियासत का इस बंटवारे से कोई लेना देना नहीं था. 562 अन्य रियासतों की तरह अंग्रजों ने इनके भविष्य का फैसला इन्हीं रियासतों पर और नए जन्म ले रहे भारत और पाकिस्तान नामक दो देशों पर छोड़ दिया था. लेकिन पड़ोसी इलाकों में खींची जा रही सीमा कश्मीर के भाग्य का फैसला तय कर रही थीं जो कि काफी रोचक था और बंटवारे से पहले ही भारत और पाकिस्तान के भावी नेताओं के बीच तनाव का कारण बनने लगी थीं.

लैम्ब आगे लिखते हैं- ’12 अगस्त को रेडक्लिफ की फाइनल रिपोर्ट तैयार हुई और 16 अगस्त 1947 को जब पब्लिश की गई तो मैप और बदल चुका था. अब फिरोजपुर का पूरा इलाका भारत में शामिल कर दिया गया ताकि सतलज नदी के पूरब का कोई इलाका पाकिस्तान के पास न रहे और लाइन सीधी हो जाए. गुरुदासपुर जिले की तीन तहसीलें भारत में शामिल कर दी गईं. मुस्लिम लीग ने इसका विरोध किया. भारत का तर्क था इन तहसीलों के बिना कश्मीर से उसका कोई कनेक्शन हीं नहीं रह जाएगा. पाकिस्तान इसके खिलाफ था और लॉर्ड माउंटबेटन पर कांग्रेस के दबाव में आने का आरोप लगा रहा था.’


562 में से अधिकांश रियासतें एक-एक कर भारत या पाकिस्तान में विलय के लिए तैयार होती गईं लेकिन कश्मीर के डोगरा राजा हरि सिंह ने दोनों देशों से खुद को दूर रखने की कोशिश की. लेकिन सब चीजें राजा के मनमुताबिक नहीं चलनी थीं, न चलीं. पाकिस्तान से सटे कश्मीर के इलाकों, गिलगिट-बालटिस्तान के इलाकों में बगावत की बिगुल बज चुकी थी. पाकिस्तान के हुक्मरान कश्मीर को भारत से दूर ही रखना चाहते थे क्योंकि उन्हें भरोसा था कि देर-सबेर मुस्लिम बहुल कश्मीर को वह हिंदू डोगरा राजा के शासन से मुक्त करा ही लेंगे. इसकी साजिशें कश्मीर के पाकिस्तान से सटे इलाके और गिलगित-बालटिस्तान में तैयार भी हो रही थीं जो आजादी के बाद अक्टूबर आते ही कश्मीर पर हमले के रूप में सामने आ ही गई.